रावण, विभीषण व कुंभकर्ण

रावण, विभीषण व कुंभकर्ण

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जब हम ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, हमें उस ज्ञान पर मान हो जाता है और हम अहंकार, दंभ से ग्रस्त हो जाते हैं।
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भौतिक शरीर तीन गुणों से संचालित होता है और उसके कर्म इन्हीं तीन के संतुलन – असंतुलन से निर्धारित होते हैं।
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ज्ञान के कारण अहंकार होने पर हम रावण बन जाते हैं।

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विभीषण और कुंभकरण यह दोनों हमारे अंतर्मन की अवस्थाएं हैं।
अहंकार से ग्रस्त होकर हम जब भी कोई कदम उठाते हैं तो हमारे भीतर का ..+विभीषण हमें बार-बार आगाह करता है। तमोगुण की अधिकता के कारण हमारा अहंकार इतना प्रभावी हो जाता है कि वह इस विभीषण को बलपूर्वक चुप कराता रहता है और विभीषण फिर भी न माने तो हमारा अहंकार उसे लात मार कर निकाल देता है।

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दूसरी और हमारे ही अंतर्मन में एक कुंभकरण भी है जो हमारे इस रवैये से क्षुब्ध एवं निराश होकर निद्रा अवस्था में चला जाता है अर्थात निष्क्रिय हो जाता है और हमें अच्छे बुरे का भेद समझाना बंद कर देता है।
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विभीषण, कुंभकरण और रावण यह हमारे भीतर व्याप्त “सत -रज – तम ” के संतुलन और असंतुलन से होने वाली अवस्थाएं हैं।