सन्तोष

सन्तोष
महात्मा बुद्ध के एक भक्त थे पूरण| एक बार पूरण ने बिहार के “सूखा” नामक क्षेत्र में धर्म प्रचार के लिए जाने का मन बनाया| उसने महात्मा जी से आज्ञा मांगी|

महात्मा बुद्ध ने फरमाया कि “वहां लोग बड़े कठोर हैं ; वे अपमान कर देंगे|”
पूरण ने कहा, अगर ऐसा है तो “मैं वहीं जाकर ही सेवा करूंगा|”

महात्मा बुद्ध ने पूरण से तीन सवालों के जवाब मांगे|
पहला, “अगर वहां लोग तुझे गालियां दें, अपमान करें तो तुझे क्या होगा?”
पूरण ने कहा, “मैं यह सोच लूंगा कि सिर्फ गालियों से ही अपमान करते हैं बेचारे| मारते तो नहीं है, मार भी तो सकते थे|”

महात्मा बुद्ध ने दूसरा सवाल किया!
“अगर वे लोग तुझे मारें पीटें, पत्थर फेंके, जूतों से स्वागत करें, तो तेरा क्या हाल होगा?”
पूरण ने उत्तर दिया, “मैं यह सोच लूंगा तब कि कितने भले लोग हैं| सिर्फ मारपीट ही रहे हैं, जान से तो नहीं मार डाला!”
महात्मा बुद्ध ने आखिरी सवाल किया!
”अगर वे लोग तुझे मार ही डालें, तो मरते वक्त तुम्हे क्या महसूस होगा?
पूरण ने उत्तर दिया, ”मैं तब यह सोच लूंगा कि कितने भले लोग हैं| ये तो मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला रहे हैं, जिसमें भूल चूक हो सकती है!”
महात्मा बुद्ध ने फरमाया कि *अब तू पूर्ण भक्त हुआ पूरण! क्योंकि संतोष की अवस्था को उपलब्ध हो चुके हो तुम! अब तुम जा सकते हो अपने धर्म प्रचार करने की सेवा पर!

श्री गुरु नानक देव जी ने भी फरमाया है कि “योगी, संतोष और लज्जा की मुद्रा बनाओ| प्रतिष्ठा की झोली धारण करो|” अर्थात कंधे पर झोली टांग कर मोहमाया के पीछे भागते रहना परमात्मा का मार्ग नहीं है|

बुढ़ापे में लोग संतोष करते हैं; गरीबी में भी लोग संतोष करते हैं| संतोष कोई असहायता नहीं है; हेल्पलैस नहीं है और यह नकारात्मकता भी नहीं है| इंसान का संतोष करना तो एक बहुत ऊंची अवस्था है|

संतोष का अर्थ है, “जितना मुझे चाहिए था, उससे ज्यादा मेरे पास है| मेरी जरूरत से ज्यादा मेरे पास उपलब्ध है| जो मैंने मांगा ही नहीं था, वह भी मुझे मिला हुआ है| संतोष का अर्थ तो अनुग्रह का ही भाव है ; धन्यवाद का भाव है| मेरे परमात्मा, तेरी मर्जी बड़ी महान है; जो तूने इतना दे दिया है मुझ गरीब को|

इसी संतोष की झोली बांध कर परमात्मा के मार्ग पर चला जा सकता है| संतोष को उपलब्ध हुए बिना हम सतगुरु के नियमों व वचनों का पालन कैसे करेंगे? सोचें जरा!




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